कबूतर प्रेम कविताएं नहीं लिखते...
मैं रविवार को पास के मेघदूत गार्डन गया। काफी देर तस्वीरें कैप्चर करके लौट रहे थे तो कुछ कबूतर एक टीले नुमा पोल पर अठकेलियां कर रहे थे। वे इस तरह अपनी दुनिया में मग्न थे कि मैं देखकर कुछ पल के लिए तस्वीर कैप्चर करना भूल गया। शायद यह पहला मौका था जब मैं उन्हें देखकर इस कदर अभीभूत था।
इन्हें देखकर महसूस हुआ कि कबूतर सदियों से चुपचाप प्रेम करते आ रहे हैं। उनको बहुत कम प्रेम कविताओं में रूपक के रूप में जगह दी गई। शायद इसीलिए, क्योंकि वे प्रेम करते हैँ, विरह भी करते हैं लेकिन कभी कविता नहीं लिखते। कबूतर की प्रेम कहानियां सुनी हैं, चिट्ठी भी ले जाने की। लेकिन कबूतर पर गाने एक ही सुनने को मिला है, अटरिया पर लोटल कबूतर रे। कुछ गजलें हैं कबूतरों पर लेकिन वह भी कम ही मिलीं। हो सकता है हों भी लेकिन जब अभी गूगल पर कबूतरों के माध्यम से लिखी गई प्रेम कविताएं सर्च की तो एक भी नहीं मिली।
कवयित्री सुशीला ने अपनी लंबी कविता 'प्रेम' में एक पैराग्राफ लिखा है:
प्रेम, कबूतरों का वह जोड़ा है
जो पिछली कई सदियों से
पर्वत गुफाओं में
गुटुरगूँ करता
पर दिखता नहीं
दिखती है सिर्फ
उनकी अपलक सी आँखें
और आँखों का पानी...!
हालांकि इस बीच बांसवाडा की चित्रकार प्रो. वीरबाला भावसार की कबूतर पर लिख्री एक खूबसूरत कविता मिल गई है। घर की मुंडेर पर कोई श्वेत कबूतर आकर बैठता है। यह भी कोई संदश ही लेकर आया है। श्वेत कबूतर:
मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
गर्मी की हल्की संध्या यों– झांक गई मेरे आंगन में
झरीं केवड़े की कुछ बूंदें, किसी नवोढ़ा के तन–मन में;
लहर गई सतरंगी–चूनर, ज्यों तन्यी के मृदुल गात पर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे अपान श्वेत कबूतर!
मेरे हाथ रची मेहंदी, उर बगिया में बौराया फागुन
मेरे कान बजी बंसी–धुन, घर आया मनचाहा पाहुन
एक पुलक प्राणों में, चितवन एक नयन में, मधुर–मधुरतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
ताना मर गयी आँखों में, मुझको उषा की अरूणाई
थितजक गयी अधरों तक आकर, बात कोई बिसरी बिसराई
ठहर गया जैसे कोई बन पाखी, मन की झुकी डाल पर
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
कोई सुंदर स्वप्न सुनहले, आंचल में चंदा बन आया
कोई भटका गीत उनींदा, मेरी सांसों से टकराया;
छिटक गई हो जैसे जूही, मन–प्राणों में महक–महक कर!
उड़ आया ऊंची मुडेर से, मेरे अपान श्वेत कबूतर!
मेरा चंचल गीत किलकता, घर—आंगन देहरी–दरवाजे
दीप जलाती सांझ उतरती, प्राणों में शहनाई बाजे
अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस–सरस स्वर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
गर्मी की हल्की संध्या यों– झांक गई मेरे आंगन में
झरीं केवड़े की कुछ बूंदें, किसी नवोढ़ा के तन–मन में;
लहर गई सतरंगी–चूनर, ज्यों तन्यी के मृदुल गात पर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे अपान श्वेत कबूतर!
मेरे हाथ रची मेहंदी, उर बगिया में बौराया फागुन
मेरे कान बजी बंसी–धुन, घर आया मनचाहा पाहुन
एक पुलक प्राणों में, चितवन एक नयन में, मधुर–मधुरतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
ताना मर गयी आँखों में, मुझको उषा की अरूणाई
थितजक गयी अधरों तक आकर, बात कोई बिसरी बिसराई
ठहर गया जैसे कोई बन पाखी, मन की झुकी डाल पर
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
कोई सुंदर स्वप्न सुनहले, आंचल में चंदा बन आया
कोई भटका गीत उनींदा, मेरी सांसों से टकराया;
छिटक गई हो जैसे जूही, मन–प्राणों में महक–महक कर!
उड़ आया ऊंची मुडेर से, मेरे अपान श्वेत कबूतर!
मेरा चंचल गीत किलकता, घर—आंगन देहरी–दरवाजे
दीप जलाती सांझ उतरती, प्राणों में शहनाई बाजे
अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस–सरस स्वर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
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