खोए हुए आंखों के हरे सपने, सीने के हरे गान

शहर में रहते हुए आंखें हरे रंग देखना भूल जाती हैं। भूल जाती हैं सासें सड़ती पत्तियों की महक सूंखना। कान भूल से जाते हैं पंछियों और झींगुराें की आवाजें सुनना। इन्हीं खोए सपनों की तलाश में मैं गया शहर के एक बाहरी कोने में पड़ी गेवियर लेक पर। उस पिन ड्राप साइलेंस वाले जंगल में कैमरे के शटर की आवाज भी शांति का ध्वंस करते हुए महसूस हो रही थी। बस दो-चार क्लिक ही किया उस दिन।

ओस-बूंद कहती है; लिख दूं
नव-गुलाब पर मन की बात।
कवि कहता है : मैं भी लिख दूं
प्रिय शब्दों में मन की बात॥
ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ
नव-गुलाब हो गया मलीन।
पर कवि ने लिख दिया ओस से
नव-गुलाब पर काव्य नवीन॥  
केदार नाथ अग्रवाल 

कहने पर भी कहीं
कही जाती है पीड़ा
पीड़ा की भूमि पर उगाता हूँ
फूल,वृक्ष,लताएं
सींचकर संचित अनुभवों से अपने
केशव
कितनी ही पीड़ाएं हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं

ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की जि़म्मेदारी उस पर है
शाम झांकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है
गीत चतुर्वेदी


हमने पौधे से कहा : मित्र, हमें फूल दो।
उस की फुनगी से चिनगियाँ दो फूटीं।
डाली से उस ने फुलझड़ी छोड़ दी :
हम मुग्ध देखते रहे कि कब कली फूटे-
कि कायश्री उस की समीरण में झूम गयी,
हमें जान पड़ा, कहीं गन्ध की फुहारें झर रही हैं
और देखा सहसा :
लच्छा-सा डोंडियों का, गुच्छा एक फूल का
हम मुग्ध ताका किये।

किन्तु हम जो देखते थे क्या वह निर्माण था?
गुच्छे हम नोच लें परन्तु वही क्या सृष्टि है?
अज्ञेय/इन्द्रधनुष रौंदे हुए थे


नहीं होती है शब्दों में-
बीच की नीरवता में होती है कविता’
नीरवता? यह क्या है?
-शब्द ने सोचा-
जानना चाहिए इसको :
चुपके से उतर गया उसमें।

                 अब चक्कर खा रहा है 
अनवरत
 नंद किशोर आचार्य/कविता का कोई घर नहीं होता 


ओ पीले पत्ते
तुम्हारी शिरा की नोक पर रुका पानी
जो रुकते रुकते गिरने वाला था और
अभी गिरते गिरते रुक गया है
जिसकी रंगत ठीक वैसी है
जैसी विगत प्रेमिकाओं की आँखों की कोर के तरल की
जब वे बाजार में मुझे मिलती हैं अपने बच्चों के साथ
लेकिन यह पानी क्यों रुका है तुम्हारी शिरा पर
क्या तुम आज किसी के लिए दुखी हो
ओ पीले पत्ते

विशाल श्रीवास्तव 



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